कागा रे ,
काहे भीगे है तू ?
निपट निठुर बरसातों में।
क्यों बैठे है तू पहरों तक,
बेहिस मानुस की,
मुंडेरों पर ?
मुंडेरों पर ?
जो ना दें बसेरा ,
ना डालें दाना
ना डालें दाना
अपने भी रिश्ते नातों को ।
जो खाली कमरों के महल बने खड़े हैं
हैं खाली,
सोच - एहसासों से भी।
जितने वीराने ये घर, मकां हैं ,
सोच - एहसासों से भी।
जितने वीराने ये घर, मकां हैं ,
उतने खोखले,
ये - इन्सां हैं।
क्या झांके है तू ,
उस पर क्षितिज के ?
किसके आने की आस लिए है ?
कोई दैवीय चमत्कार होना है ?
या स्वर्ग मार्ग से ,
देव दूत आने हैं ?
या यूँ ही टोह लगाता है
हर घर ,
अतिथि के आने की ?
क्या कोई,
काली कोयल थी ?
मीठी-मीठी बातों वाली।
क्या छोड़ गई है तुझको भी ?
वो,
कहीं नहीं जो बसती थी।
अरे जा रे कागा ,
ये बारिश भी
आज जंग ही फाने बैठी है।
तेरे हठ को - तेरी हिम्मत को
क्यों आज
डुबाने बैठी है ?
जा जा रे कागा , दूर कहीं
किसी जंगल में ,
किसी पर्वत पर।
एक नीड़ बसा , एक छाँव बना
बस खुद का ,
या फिर साथ किसी
ना ढूढ़ अथाह आसमानों में
कोई चमत्कार
होने की आहट।
ना कर बिछड़ों के ,
फिर से ,
लौटने की चाहत।
तू खुदी है ,
खुद ही है खुदा ,
अरे अब, जा रे कागा , जा उड़ जा !!

ये - इन्सां हैं।
क्या झांके है तू ,
उस पर क्षितिज के ?
किसके आने की आस लिए है ?
कोई दैवीय चमत्कार होना है ?
या स्वर्ग मार्ग से ,
देव दूत आने हैं ?
या यूँ ही टोह लगाता है
हर घर ,
अतिथि के आने की ?
क्या कोई,
काली कोयल थी ?
मीठी-मीठी बातों वाली।
क्या छोड़ गई है तुझको भी ?
वो,
कहीं नहीं जो बसती थी।
अरे जा रे कागा ,
ये बारिश भी
आज जंग ही फाने बैठी है।
तेरे हठ को - तेरी हिम्मत को
क्यों आज
डुबाने बैठी है ?
जा जा रे कागा , दूर कहीं
किसी जंगल में ,
किसी पर्वत पर।
एक नीड़ बसा , एक छाँव बना
बस खुद का ,
या फिर साथ किसी
ना ढूढ़ अथाह आसमानों में
कोई चमत्कार
होने की आहट।
ना कर बिछड़ों के ,
फिर से ,
लौटने की चाहत।
तू खुदी है ,
खुद ही है खुदा ,
अरे अब, जा रे कागा , जा उड़ जा !!

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