Sunday, 21 June 2015

कागा रे !!

कागा रे , 
काहे भीगे  है तू ?
निपट निठुर बरसातों में।  

क्यों बैठे है तू पहरों तक, 
बेहिस मानुस की,
 मुंडेरों पर ?

 जो ना दें बसेरा , 
ना  डालें  दाना 
अपने भी रिश्ते नातों को ।  

जो खाली कमरों के महल बने खड़े हैं 
हैं खाली,
सोच - एहसासों से भी।  

जितने वीराने ये घर, मकां  हैं ,
उतने  खोखले
ये - इन्सां  हैं।  

क्या झांके है तू , 

उस पर क्षितिज के ?
किसके आने की आस लिए है ?

कोई दैवीय  चमत्कार होना है ?

या स्वर्ग मार्ग से , 
देव  दूत  आने  हैं   ?

 या यूँ ही टोह  लगाता  है 

हर घर ,
अतिथि के आने की ?


क्या  कोई,

काली कोयल थी ?
मीठी-मीठी बातों वाली।  

क्या छोड़ गई है तुझको भी ?

वो,
कहीं नहीं जो बसती थी।  

अरे जा रे कागा , 

ये बारिश भी 
आज जंग ही फाने बैठी है।  

तेरे हठ  को - तेरी हिम्मत को 

क्यों आज
 डुबाने बैठी है ?

जा जा रे कागा , दूर  कहीं 

किसी जंगल में ,
किसी पर्वत पर।  

एक नीड़ बसा , एक छाँव बना  

बस खुद का , 
या फिर साथ किसी 

ना ढूढ़ अथाह आसमानों में 

कोई चमत्कार
 होने की आहट।  

ना कर  बिछड़ों के , 

फिर से ,
लौटने की चाहत।  

तू  खुदी है ,

खुद ही है खुदा ,
अरे अब, जा रे कागा , जा उड़ जा !!




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