Tuesday, 2 February 2016

कोरे कागज़ !!

हज़ारों कोरे कागज़ सी बिखरी है ज़िन्दगी मेरी
जाने किस कहानी, शेर या फ़क़त एक अशरार
का इंतज़ार करती हुई  ..

मेरे नाटक के पर्दों में छुपे हुए तमाम अनदेखे रंग हैं

जो बरबस ही मारे जाते हैं , समेत कर उनको मुझसे
एक नयी दास्तान की इसरार करते हैं ..

जब मैं एक ही किरदार रोज़ निभा जाती हूँ

इन बेरस पलों में खुद से ही उलझती
ये सब बेढंगे से सवाल करती है ..

एक कोरे टाट की शकल में, कुछ बासी सूखे रंगों से खेलती हुई

एक बेतरतीब सी - मेरे जैसी - तस्वीर बनाने को
ये शायद मुझसे कहती है  ..

समुन्दर के किनारे से देखा था , सुनहरे आसमान से लगी हुई

मौजों से खेलती, फलक के संग संग चलती हुई
साहिल से दूर एक छोटी सी नाव लगती है ..

कोई नायिका है शायद, अभी अभी नहाई हुई सी

भीगे केशों को झटक कर , सुर्ख मोगरे  के फूल सजाते हुए
श्रृंगार दान के सामान को निहारती हुई सी ..


जो भी हो ....


पर कोरे कागज़ पे थमना क्यों है ?

एक आगाज़ बना लेते इसको , विस्तार बना लें सपनों का ,
या महज़ एक वादा कर दो - खुद अपना साथ निभाने का
                                         इस जीवन के कोरेपन में !!!


 ~Kinksha