Friday, 10 July 2015

इस पार - खुद को हार कर !!

रोज़ "खुद" पे मखमली-सी, स्याह चादर डाल कर
निकलती हूँ घर से हर शब - सुबह, 
एक अथाह सी तलाश में 
मिलती हूँ सब लोगों से मगर ,
नयी सूरतों के हिजाब में   !!


तरसती है खाल-ऐ-रूह अब, सुनहरी धूप के स्पर्श को 
परतों में जिसको कैद कर ,
रखा हिफाज़त से कहीं
महफूज़ डरती फिर रही हूँ,
जाने किस लोक -लाज से !!


अपनी गुमनामी को मैं, हूँ ढूंढती रिश्तों के सूखे बाग़ में
पढ़ते हों जिंदगी का फलसफा ,
जैसे धर्मं, पोथी - पुराण में
सिमटी हो कल कल ये नदी  .. 
झीलों में समुन्दर जान कर !!


घुटती हुई सी आरज़ू, नासूर सी अब बन गई
गहराईयों से - डूबने से , साँसों की भी ठन गई
थमते नहीं जज़्बात, और एहसास मेरे अब मगर   
क्या पा रही हूँ और किसके  लिए
इस पार -  खुद को हार कर  !! 

                         इस पार -  खुद को हार कर  !!

Thursday, 2 July 2015

माँ ने मेरे लिए एक गुड़िया भेजी है !!

माँ ने मेरे  लिए एक गुड़िया भेजी है... .. 

मेरे बचपन के कुछ पुराने कपड़ों में
उसको अपनेपन से सज़ा कर..
उसकी आँखों की चमक में
उसकी आवाज़ की चहक में
अपनी ही मासूम सी परछाईं को बसा कर ... ..


                 माँ ने मेरे  लिए एक गुड़िया भेजी है ... ..


प्यार भेजा है , सम्मान भेजा है
मेरे छुटपन के सपनों का सामान भेजा है
एक  खिलखिलाती हुई हंसी का पिटारा भेजा है
जो खुलते ही उजला हर मन कर देता है ... ..


माँ ने मेरी आवारगी- बेपरवाही में
सेंध लगा के रखने को
एक ज़िम्मेदारी का एहसास भेजा है ... ..


एक सोने की बाली भेजी है,
नाक की नथ , कुछ नए कपड़े भेजे हैं
मेरे फैशन वाले शौक से ले कर
ज़रूरत तक का इंतज़ाम भेजा है ... ..


                        माँ ने मेरे  लिए एक गुड़िया भेजी है ... ..


याद है मुझे , कुछ रोज़ पहले ,
यूँ ही माँ से इसरार किया  था
इस दूर देश में अकेले होने की शिकायत जताई थी
तभी माँ ने मुझे ये अपनेपन का उपहार  भेजा है ... ..

कुछ मठरी - नमकीन भेजी है ,
 दशेहरी आम की चाशनी में मिला कर
मेरे अकेलेपन के खातिर -
ये मीठी दवा की पुड़िया भेजी है ... ..

                    माँ ने मेरे  लिए एक गुड़िया भेजी है ... ..


माँ ने बोलती हुई एक
" चंदा की कटोरी" भेजी है ,
तन्हा रातों में नींद दिलाती हुई ,
एक बेहद सुरीली "लोरी" भेजी है ... ..

ऐसी ज़िन्दगी की भीड़ में ,
जब लोग अक्सर खुद को खो देते हैं
माँ ने मेरे बचपन की मेरी,
मासूमियत वाली तस्वीर भेजी है ... ..


माँ खुद नहीं आ पाई ,
तो  गुड़िया के मोह में
अपने निश्छल ममता का
स्वरुप भेजा है ... ..

जिसको मैंने भगवान् से दुआओं में माँगा था
अपनी पीठ पे बिठा के सैर कराती थी
फटकारा , दुलारा , सिखाया
नाजों से जिसकी हिफाज़त की थी  ... ..

माँ ने फिर से -

          वही मेरी बचपन  वाली गुड़िया भेजी है !!