Friday, 10 July 2015

इस पार - खुद को हार कर !!

रोज़ "खुद" पे मखमली-सी, स्याह चादर डाल कर
निकलती हूँ घर से हर शब - सुबह, 
एक अथाह सी तलाश में 
मिलती हूँ सब लोगों से मगर ,
नयी सूरतों के हिजाब में   !!


तरसती है खाल-ऐ-रूह अब, सुनहरी धूप के स्पर्श को 
परतों में जिसको कैद कर ,
रखा हिफाज़त से कहीं
महफूज़ डरती फिर रही हूँ,
जाने किस लोक -लाज से !!


अपनी गुमनामी को मैं, हूँ ढूंढती रिश्तों के सूखे बाग़ में
पढ़ते हों जिंदगी का फलसफा ,
जैसे धर्मं, पोथी - पुराण में
सिमटी हो कल कल ये नदी  .. 
झीलों में समुन्दर जान कर !!


घुटती हुई सी आरज़ू, नासूर सी अब बन गई
गहराईयों से - डूबने से , साँसों की भी ठन गई
थमते नहीं जज़्बात, और एहसास मेरे अब मगर   
क्या पा रही हूँ और किसके  लिए
इस पार -  खुद को हार कर  !! 

                         इस पार -  खुद को हार कर  !!

No comments:

Post a Comment