रोज़ "खुद" पे मखमली-सी, स्याह चादर डाल कर
निकलती हूँ घर से हर शब - सुबह,
एक अथाह सी तलाश में
मिलती हूँ सब लोगों से मगर ,
नयी सूरतों के हिजाब में !!
तरसती है खाल-ऐ-रूह अब, सुनहरी
धूप के स्पर्श को
परतों में जिसको कैद कर ,
रखा हिफाज़त से कहीं
रखा हिफाज़त से कहीं
महफूज़ डरती फिर रही हूँ,
जाने
किस लोक -लाज से !!
अपनी गुमनामी को मैं, हूँ ढूंढती
रिश्तों के सूखे बाग़ में
पढ़ते हों जिंदगी का फलसफा ,
जैसे धर्मं, पोथी - पुराण
में
सिमटी हो कल कल ये नदी ..
झीलों में समुन्दर जान
कर !!
घुटती हुई सी आरज़ू, नासूर
सी अब बन गई
गहराईयों से - डूबने से ,
साँसों की भी ठन गई
थमते नहीं जज़्बात, और
एहसास मेरे अब मगर
क्या पा रही हूँ और किसके लिए
इस पार - खुद को हार कर !!
इस पार - खुद को हार कर !!
इस पार - खुद को हार कर !!
No comments:
Post a Comment