Tuesday, 3 August 2021

भक्ति - एक अपवाद !!

तुम्हें ही  पूजती हूँ 
तुमसे ही नाराज़ हूँ 
तुम्हारी भक्ति का 
मैं एक अपवाद हूँ !

राह दिखाने का काम तुम्हारा 
चलते  जाने का मेरा 
मंज़िल ना मिली  तो 
तो सिर्फ मैं क्यों उदास हूँ ? 

रहनुमा होने के साथ 
रहबरी का वादा भी तो था 
हर कामयाबी हर नाकामी में 
तुम्हारा हिस्सा आधा भी तो था !

क्या कभी मन नहीं करता कि 
कुछ बोल दो ?
अप्रत्यक्ष ही सही 
दो मौजूदगी का एहसास तो !

सब देख रहे हो, या सुन नहीं सकते 
सुन रहे हो, कुछ कर नहीं सकते ?
या बस आँखें खोल कर, पथराई सी मुस्कान लिए 
बुत बन कर सब घटने के साक्ष्य बने हो  ! 

अगर मुझ में ही बसते हो 
तो मेरा दर्द भी तो जानते होगे ?
खून भले मेरा होता है
तीस का एहसास तो समझते होगे  ?

या तो बस मनोहर कहानी हो तुम 
ना हाइड्रोजन ना ऑक्सीजन 
ना ही पानी हो तुम 
इंसान के अकेले लड़ने की निशानी हो तुम !

ये धर्म का ज्ञान नहीं है 
ये आध्यात्म की बात है 
ये खुद से खुदा का 
मात्र एक संवाद है !

तुम्हारी भक्ति एक अपवाद है !



Monday, 2 August 2021

यकीन कैसे कर लूँ !!

तुम्ही हो ये बाँहों में यकीन कैसे कर लूँ
दिखते हो निगाहों को यकीन कैसे कर लूँ
तुम तो ख़्वाबों में रहते थे आसमानों में कहीं
ये हक़ीक़त अगर है तो यकीन कैसे कर लूँ 


साथ होने के एहसास महज़ लम्हें बन गए थे यादों के
मेरे कहने पे तेरे सुनने तक लकीरें जो खिचतीं थी चेहरे पे
वो आज साफ़ सामने देख सकती हूँ
बादल वो बरस  पड़े हैं , यकीन कैसे कर लूँ

के जिन बातों के खजाने पर घडी की पाबंदियां थी
आज उसकी बैटरी निकल के वक़्त को रोक ने का भ्रम हुआ
क्या सच में अब टेलीफोन और इंटरनेट की कम असली तारें नहीं है
रूबरू होने का ये एहसास असली है, यकीन कैसे कर लूँ  !!


जो हर पल पंडेमिक में अधूरी  ख्वाहिशों लिए जी रहे थे
इंतज़ार की चक्ति लगा के मनोबल को सी रहे थे
पिछली मुलाकात आखिरी न हो जाये 
ये डर कुछ काम हुआ है , यकीन कैसे कर लूँ  !!

ये तुम ही हो सामने यकीन कैसे कर लूँ  !!
ख्वाब नहीं  हक़ीक़त है यकीन कैसे कर लूँ  !!