Monday, 9 January 2017

तू अकेला है!

तू अकेला  है , तेरे साथ है बस तू
रिश्तों के ये स्वांग
कितने भी रचा ले तू ।

तुझे तो याद ही होगा ,

वो जब थोकर से गिरे थे तुम
तरस की नज़र भर थी, ना हाथ संबल का

तू अकेला है , की जब शाम ढलते ही

तेरे द्वंद्व की आंधी पुरज़ोर चलती थी
उपहास तेरी उलझनों का सबने उड़ाया था।

 याद है ना जब तुझे , उसके सहारे की ज़रूरत थी

वह मुह फुलाए बैठ कर
तंज़ तुझ पे ही कसता था ।

तू अकेला है , जब तूने दिया सब कुछ ,

ओछे नामों से चरित्र-हीन कह ,
उसने पुकारा था।

तू अकेला है , तो अब उदास क्यों है तू ?

तू जानता है न आ, यूँ ही हुआ हरदम
जब भी दिलासे की तुझको ज़रूरत थी।

तू अकेला है , जब ये जानता है तू

तो फिर टूटा हुआ मन का,
है आशियाना क्यों ?

तू अकेला है , तो अब क्यों आस है बाकी ?

समझेगा कभी जिसने
चरित्र तेरा नहीं जाना

तू अकेला है , तो धुल  जाने दे अश्रु में

जो औरों पे रखे तूने
विश्वास बाक़ी थे।

तू अकेला है , 

दर्द, " उम्मीदों " से मिलते हैं
 ये जानता है तू !

Sunday, 8 January 2017

आँखों पर धुंध के बादल !

आँखों पर जो धुंध के गहरे बादल थे
आज अश्रु की धार से - धुल गए  !
पलकों पर जो बाज़ारू काजल की 'झूठी' कालिख थी
घुलते हुए नमकीन पानी की लकीरों में कुछ लिख के गया  ।  

एक रास्ता सा शायद खींच के गया है

दो बीहड़ के सूखे खण्डों में
जहाँ कुछ था तो धूल की परतें
और नकली मुस्कान का एक सूखा तालाब ।

शिकवों को ले बह गई नदी

जो बस तुमसे ही आते थे
जो बिन  सोचे समझे खुद की हस्ती में
ना जाने क्यों इतराते थे।

याद्दाश्त पुरानी खो कर वो

शायद भूलें है सब बीती बातें
घटनाएं जिनमें तुम थे हताश
पर मुझपे था पूरा विश्वास।

कुछ और बहा एक लहर रूप में

हवा का आया एक थपेड़ा
हाँ तुम्हारे तिरस्कार का ही
वो ले बहता एहसास चला

इस बंजर में देखें है बाकी क्या,

आँखों में है अब शून्य बना
विश्वास का , एहसास का
मिलने वाले किसी दर्द के आभास  का।

आँखों पर जो धुंध के गहरे बादल थे

जो आज अश्रु की धार से - धुल गए  ! !