आँखों पर जो धुंध के गहरे बादल थे
आज अश्रु की धार से - धुल गए !
पलकों पर जो बाज़ारू काजल की 'झूठी' कालिख थी
घुलते हुए नमकीन पानी की लकीरों में कुछ लिख के गया ।
एक रास्ता सा शायद खींच के गया है
दो बीहड़ के सूखे खण्डों में
जहाँ कुछ था तो धूल की परतें
और नकली मुस्कान का एक सूखा तालाब ।
शिकवों को ले बह गई नदी
जो बस तुमसे ही आते थे
जो बिन सोचे समझे खुद की हस्ती में
ना जाने क्यों इतराते थे।
याद्दाश्त पुरानी खो कर वो
शायद भूलें है सब बीती बातें
घटनाएं जिनमें तुम थे हताश
पर मुझपे था पूरा विश्वास।
कुछ और बहा एक लहर रूप में
हवा का आया एक थपेड़ा
हाँ तुम्हारे तिरस्कार का ही
वो ले बहता एहसास चला
इस बंजर में देखें है बाकी क्या,
आँखों में है अब शून्य बना
विश्वास का , एहसास का
मिलने वाले किसी दर्द के आभास का।
आँखों पर जो धुंध के गहरे बादल थे
जो आज अश्रु की धार से - धुल गए ! !
आज अश्रु की धार से - धुल गए !
पलकों पर जो बाज़ारू काजल की 'झूठी' कालिख थी
घुलते हुए नमकीन पानी की लकीरों में कुछ लिख के गया ।
एक रास्ता सा शायद खींच के गया है
दो बीहड़ के सूखे खण्डों में
जहाँ कुछ था तो धूल की परतें
और नकली मुस्कान का एक सूखा तालाब ।
शिकवों को ले बह गई नदी
जो बस तुमसे ही आते थे
जो बिन सोचे समझे खुद की हस्ती में
ना जाने क्यों इतराते थे।
याद्दाश्त पुरानी खो कर वो
शायद भूलें है सब बीती बातें
घटनाएं जिनमें तुम थे हताश
पर मुझपे था पूरा विश्वास।
कुछ और बहा एक लहर रूप में
हवा का आया एक थपेड़ा
हाँ तुम्हारे तिरस्कार का ही
वो ले बहता एहसास चला
इस बंजर में देखें है बाकी क्या,
आँखों में है अब शून्य बना
विश्वास का , एहसास का
मिलने वाले किसी दर्द के आभास का।
आँखों पर जो धुंध के गहरे बादल थे
जो आज अश्रु की धार से - धुल गए ! !
No comments:
Post a Comment