एक वक़्त के बाद, रिश्ते
घर की किसी दीवार पर लटकी हुई पुरानी तस्वीर ,
या पड़े हुए पोस्टर्स जैसे हो जाते हैं ,
जिनकी महज़ मौजूदगी भर रह जाती है , एहमियत नहीं ।
हम उन्हें रोज़ देखने के इतने आदी हो जाते हैं कि
हमारे एहसासों से कोसों दूर , वो पोस्टर्स
बेजान दीवार का एक हिस्सा लगते ह ैं।
सुबह शाम गलती से नज़र चली भी जाती है तो ,
बेज़ार सी आँखें, वापिस अपने काम में यूँ लग जाती हैं,
जैसी जिनको अभी देखा उन्होंने पुरानी तस्वीरों में ,
उनसे - "अब" कोई ख़ास वास्ता नहीं रहा ।
गुज़री ज़िन्दगी की सुनहरी यादें थीं जैसे ,
बीत गईं ।
यूँ की जैसे उनका हमारे वर्तमान से ,
या फिर यूँ ही चला तो भविष्य में भी ,
कोई स्थान न होगा ।
वो बस हमारी यादों को सजाने का काम करती हैं ,
और हाँ दुखी करने का भी ।
जब यादों के पल वर्तमान थे ,
रिश्तों में गर्माहट थी , प्रेम था ।
वो वक़्त याद आता है तो बुरा लगता है ।
उन तमाम एहसासों की नश्वरता पर ,
अफ़सोस होता है, निराशा भी ।
झुंझलाहट होती है ।
तस्वीरें कितनी भी खूबसूरत हों,
एहसासात से ज्यादा तो नहीं हो सकतीं ना । ।

कई बार रिश्ते सिर्फ तस्वीरों में ही बचते हैं. एहसास गुम जाते हैं. तुमको नहीं लगता कि उनको फिर तस्वीरों में ही सजाकर रखना अधिक बेहतर होगा।
ReplyDeleteमगर रिश्ते कोई बेजान तस्वीर नहीं.. वो दीवार पर सजाने के लिए नहीं ज़िन्दगी में अपनी एहमियत निभाने के लिए होते हैं सर ! !
Deleteजब किसी के लिए रिश्तों की अहमियत खत्म हो जाए तो वो तस्वीरों में बचे रहे यही बहुत है. कई बार तो इतना भी नहीं संभव होता.
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