Friday, 13 March 2015

ये बारिशें !!!


वो भी एक दौर था,
जब बारिशें द॓खत॓ ही
तुम याद आ जात॓ थ॓.
और याद आ जात॓ थ॓
वो तमाम खूबसूरत लम्हे ..
जो दूर रह कर भी हमन॓
साथ में गुजार लिए थ॓ ।

जान॓ कैस॓ वो फ़ुहारें
समझ और दूरियोॱ की स्वरचित  
धूल को शाँत करत॓ हुए
मुझ॓ अँतरमन तक गीला कर जाती थी ..
और मैं - माटी एक स॓ सोन्धे  हो जात॓ थ॓ ।।

कैसे  मेरे मगन मन का मोर
तुम्हें  बादलों  में तलाशते,
अपनी ही किसी मदमस्त धुन पर नाचते हुए..
ये सोचता था कि
कहीं तो किसी बादल कि ओट से छुप कर
तुम भी मुझे यूँ ही देख कर खुश हो रहे होंगे...


तब ऐसे ख्यालों  में घूमते हुए
दोनों के हिस्से कि बारिश में
अकेली ही भीग लेती थी मैं..
फिर तौलिए से अपनी जुल्फेन आज़ाद करते हुए
आईने में खुद को  निहार के इतरा भी लेती थी
और अपनी ही आगोश में सिमट कर थोड़ी कम सर्द हो जाती थी!!

हाँ थोड़ी कम सर्द..
अब काफी सर्द हो गई हूँ
शायद इसलिये अब दूरीयॉ ज़्यादा  हावी  हो जाती हैं और अपनी आगोश से सर्दी नहीं जाती
अब..




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