जब सब कुछ पा लेने कि चाहत नहीं होती ,
भीड़ में कहीं कहीं खो ना जाने कि ज़ेहमत नहीं उठानी होती ,
सबसे आगे -- निकल जाने की होड़ नहीं लगी होती . .
जब किसी मुकाम पर जल्दी से जल्दी पहुँच जाने कि , कोई ज़रूरत नहीं होती …
तभी तो शायद मेरे पास वक़्त होता है अपने एहसास में घुल पाने का…
अपनी साँसों को महसूस करने का…
और धड़कनों को सुन कर ज़िन्दगी का इत्मिनान करने का …
वो सब कुछ जो दिन कि रौशनी में अनदेखा रह गया,
उसे करीब से देख पाने का और फिर
उस में ही समा जाने का ।
यही तो वक़्त होता है जब पंखे का शोर भी
मेरी साँसों के रिथम (rythm) में लगता है …
और हम चले जाते हैं अपनी ख्यालों कि दुनिया में…
वही ख्यालों कि दुनिया जो हर रोज़ नयी सूरत बदलती रहती है,
कभी कभी तो एक ही रात में कई सूरतें भी दिखा देती है … सच !!
वो रात ही तो होती है जो टेलीफोन के नेटवर्क से
दिलों के तार जोड़ देती है ..
उनसे , जिनसे आप दूर चले आए हैं ,
कुछ चाहतों को मुकम्मल करने ,
अपने सपनों में ही अपनी पहचान तलाश करने …
उन सबसे दूर , जिनके बिना हम अधूरे तो हैं
फिर भी पूरे होने कि ज़िद्द किये बैठे हैं … क्यूँ है ना ?
रात ही तो है , जब सरे काम , सोच- विचार ,
दुनियादारी का निबाह करने के बाद …
अँधेरे में … तकिये पर सर रख कर ,
नींद के आने का इंतज़ार करते हुए - " तुम्हारा " ख़याल आता है !!
और हम … दूरियों के सारे समुन्दर पार कर के ,
समझ कि देहलीज़ अनदेखी करते हुए ....
मेरे ख्यालों - मेरे सपनों कि दुनिया में --- साथ हो लेते हैं :)
जैसे एक दूसरे को देखते हुए , साथ होने का एहसास ही काफी होता है …
बस सांसें चलती रहती हैं …
और ख़ामोशी में भी , बात हो जाती है …
सुकून सा दिल में भर जाता है और नींद मेरी आँखों का पता पूंछते हुए --
आखिर,
मुझ तक पहुँच ही जाती है !!
दिन चाहे जैसे भी गुज़रे हों , हर रात मैं तो उसी रात को जीती हूँ …
जिस रात हम -तुम सच में साथ थे …
बिलकुल ऐसे ही …
--- सपने वाली रात थी ना वो !!

भीड़ में कहीं कहीं खो ना जाने कि ज़ेहमत नहीं उठानी होती ,
सबसे आगे -- निकल जाने की होड़ नहीं लगी होती . .
जब किसी मुकाम पर जल्दी से जल्दी पहुँच जाने कि , कोई ज़रूरत नहीं होती …
तभी तो शायद मेरे पास वक़्त होता है अपने एहसास में घुल पाने का…
अपनी साँसों को महसूस करने का…
और धड़कनों को सुन कर ज़िन्दगी का इत्मिनान करने का …
वो सब कुछ जो दिन कि रौशनी में अनदेखा रह गया,
उसे करीब से देख पाने का और फिर
उस में ही समा जाने का ।
यही तो वक़्त होता है जब पंखे का शोर भी
मेरी साँसों के रिथम (rythm) में लगता है …
और हम चले जाते हैं अपनी ख्यालों कि दुनिया में…
वही ख्यालों कि दुनिया जो हर रोज़ नयी सूरत बदलती रहती है,
कभी कभी तो एक ही रात में कई सूरतें भी दिखा देती है … सच !!
वो रात ही तो होती है जो टेलीफोन के नेटवर्क से
दिलों के तार जोड़ देती है ..
उनसे , जिनसे आप दूर चले आए हैं ,
कुछ चाहतों को मुकम्मल करने ,
अपने सपनों में ही अपनी पहचान तलाश करने …
उन सबसे दूर , जिनके बिना हम अधूरे तो हैं
फिर भी पूरे होने कि ज़िद्द किये बैठे हैं … क्यूँ है ना ?
रात ही तो है , जब सरे काम , सोच- विचार ,
दुनियादारी का निबाह करने के बाद …
अँधेरे में … तकिये पर सर रख कर ,
नींद के आने का इंतज़ार करते हुए - " तुम्हारा " ख़याल आता है !!
और हम … दूरियों के सारे समुन्दर पार कर के ,
समझ कि देहलीज़ अनदेखी करते हुए ....
मेरे ख्यालों - मेरे सपनों कि दुनिया में --- साथ हो लेते हैं :)
जैसे एक दूसरे को देखते हुए , साथ होने का एहसास ही काफी होता है …
बस सांसें चलती रहती हैं …
और ख़ामोशी में भी , बात हो जाती है …
सुकून सा दिल में भर जाता है और नींद मेरी आँखों का पता पूंछते हुए --
आखिर,
मुझ तक पहुँच ही जाती है !!
दिन चाहे जैसे भी गुज़रे हों , हर रात मैं तो उसी रात को जीती हूँ …
जिस रात हम -तुम सच में साथ थे …
बिलकुल ऐसे ही …
--- सपने वाली रात थी ना वो !!

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