मैं जब ढूंढने जहाँ में
मोहब्बत निकला ..
हर शख्स में ..
हर मंजर पे ..
गर मिला तो,
खुद से ही मिला .. ||
तमाम रिश्तों में , दोस्तों में ..
मेरे यार में , उसके प्यार में
या राह पे चलते हुए
यूँ ही मिले मुसाफिर में ||
दूर से सुनाई देती मंदिरों की घंटियों में ..
बनारस की गंगा आरती में
या अजमेर की एक सर्द शाम,
ग़रीब-नवाज़ की दरगाह पर
पीर को निहारती कातर निगाहों में
हाथ फैलाए, कांपते होठों की दुआओं में ||
दिल्ली की उस भोर में
अपने अज़ीज़ के साथ
लाल किले के बैरिकेड वाले दर्शन में
गुरुद्वारे की सबेरे की चाय और गुरबानी में
नयी जगह पे सबसे अनजान होते हुए भी
डर क्यों नहीं लगा ?
वहां पर भी मैं खुद से ही मिला ||
उन् अँधेरी रातों में ..
जब अकेलापन गहराता था
किसी के पास होने का एहसास चाहिए था
बस एक बार ज़रूरत होती थी ,
किसी का हाथ पकड़ लेने की
मेरे सर पे हाथ रख देने की
पर वक़्त और दूरियों से परे ..
मेरा साथ तो बस वही था ... मैं खुद ||
हाँ मैं प्यार तो करता हूँ तुम सबसे ..
पर शायद खुद से ज्यादा नहीं कर पाउँगा ||
Kinksha
28 June 2014
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