Thursday, 1 December 2016

मैं, फिर चलना सीख जाता हूँ !!

जब खुद पे doubt  आता है 
जब ये दिल घबराता है
कुछ न समझ जब पाता हूँ 
मैं, तेरे दर पर आता हूँ !!

जब  परिस्थिति  विषम सी  रहती है 

जब चोटें "एहम" भी सहती है 
सांसें, दर्द से मद्धम चलतीं  हैं 
मैं "तेरी" खोज में निकलता हूँ !!

जब  डर  का  तांडव   मचता   है 

पश्चाताप का तूफ़ान चलता है 
धूल - उलाहना की उड़ती है 
तब तुझमें, छुपने आता हूँ  !!

छलनी  जिगर  का  हर  कोना  रहा 

पर सौ चोटों से भी, ना बहा 
है सर्द जमा यूँ लहू मेरा 
तेरी धूप की राह है निहारता !!

जब  सन्नाटा  बरपाया  है 

मन का द्वन्द्व और गहराया है 
जब अपना अस्तित्व धुंधलाया है 
मैंने  तेरा  नाम  गुहराया है !!

तू  फिर  भी,  मुझे  सुन  पाता है ?

मेरा हाथ थामने  आता है ? 
एक कातर नूतन ज्योत जला 
अन्धकार, कमतर कर  जाता है  !!

मैं  पुनः  उठता  हूँ  चोटिल  खुदी  में  

कुछ कदम ज़रूर  लड़खड़ाता हूँ 
पर साथ है तू, ये जानकार 
मैं, फिर  चलने  लग  जाता हूँ  !!
       मैं फिर - 
           चलने लग जाता हूँ  !!


               Kinksha !! 

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