Monday, 14 November 2016

सब कुछ तो था - बस तू ही ना था !!


एक बसा हुआ संसार भी था
कुछ अपनों का प्यार भी था
तेरे चुने बनावटी रिश्तों का
एक सजा हुआ बाजार भी था !

                   सब कुछ तो था - बस तू ही ना था !!

इंकार भी था, इकरार  भी था
थी कुछ इज़्ज़त
तिरस्कार भी था

                  सब कुछ तो था - बस तू ही ना था !!

एक रोज़ी थी
मकान भी था
अख़राजात का इंतज़ाम  भी था

                  सब कुछ तो था - बस तू ही ना था !!


निराशा थी , अरमान भी था
भूत का बंधन , भविष्य की उलझन
पर तेरा  वर्तमान  न था

                   सब कुछ तो था - बस तू ही ना था !!

जब भीड़ लगी थी अपनों की
तब बात चली थी सपनों  की
प्रेम था - प्रियतम भी था

                  सब कुछ तो था - बस तू ही ना था !!

मुस्कान रखी थी होठों पे 
थी आँखें  वेदना में डूबी 
एक बेमन सा इंसान भी था 

                  सब कुछ तो था - बस तू ही ना था !!


जब तन्हाई ने घेरा था 
प्रिय ने तुमसे मुख मोड़ा था 
तब दिशाहीन जब फिरते थे 

                  सब कुछ तो था - बस तू ही ना था !!

 मैं था तब भी तुमने सुना नहीं 
खुद के संग रहना ही चुना नहीं 
अब हुए मुखातिब मैं और तू 

            अब कुछ नहीं हैं , 
            पर "तू "  तो  है ,   
           जो  दरअसल मैं ही हूँ 
            तो अब सब कुछ है !! 

                         सब कुछ तो था - बस मैं ही ना था !!

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