Tuesday, 17 November 2015

तुम्हारी याद आती है !


चाय की चुस्कियों में बीच में जब
मन की कोई, बात आती है
सन्नाटे  में अकेले में जब नहीं
तेरी आवाज़  आती  है,

         तुम्हारी  याद आती है !


पीते हुए ही बीच में
हिम्मत छूट जाती  है
एक सिगरेट अकेले मेरे लिए 
काफी हो जाती है,

            तुम्हारी  याद आती है  !

बिस्तर पर पड़े हुए घंटों
हर रोज़, देर रात  तक
दिन भर की थकन के  बाद भी
 'नींद' जब नहीं आती

            तुम्हारी  याद आती है !

वो चादर स्याह आसमां की
जो हर रात ओढ़ती है   
कि जिसमें चाँद की
 धूमिल सी रेखा, झिलमिलाती है

सन्नाटे में वो झींगुर की
बेसुरी सी राग में जब
तुम्हारे गुनगुना के पास आने की
आहट नहीं आती,

              तुम्हारी  याद आती है !


बहोत हैं रंग मेरे श्रृंगार में
चमकती काजलों की धार  में
मेरे चेहरे  पे फिर सुर्खी
ये कैसे छूट जाती है

               तुम्हारी  याद आती है !


बहोत सोचा की अब इस सम्मान को भूल कर
चली आऊं  तुम्हारे पास में, एक बार फिर  से दौड़ कर
मगर क्या मालूम, क्या मालूम -कि चाहते हो तुम भी यूँ ही ?
ये सोचते ही हिम्मत छूट जाती है ,

                 तुम्हारी  याद आती है  !


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